बिना त्याग, तपस्या और अनुशासन के विपक्ष की वापसी मुश्किल - डॉ. अंकित नाहटा
विपक्ष लोकतंत्र का पर्याय है, और जहां विपक्ष नहीं वहां लोकतंत्र नाम मात्र का होता है या ऐसे कहे की लोकतंत्र के नाम पे वो तानाशाही और राजतंत्र होता है ।
भारत जो 140 करोड़ से ज्यादा की आबादी वाला मुल्क है, यहां विपक्ष का ना होना मतलब लोकतंत्र और लोगों की आवाज की हत्या जैसा हो सकता है । आज जिस तरह से विपक्ष काम कर रहा है उससे यह साफ साफ नजर आता है की बीजेपी के सामने उनका टिकना और राजनीनिक लक्ष्य हासिल करना मुश्किल है ।
विपक्ष जहां आंतरिक लोकतंत्र ज्यादा है, जहां हर इंसान लगभग व्यक्तिगत सफलता के लिए ज्यादा कोशिश करता है, एक दूसरे को नीचे गिराना यह सोच कर की शायद इसके पतन के बाद ही मेरी तर्रकी संभव है, केंद्रीय नेतृत्व का जमीनी लेवल तक पकड़ बीजेपी के मुकाबले काफ़ी कमजोर है।
बीजेपी जहां बगावत मतलब राजनीतिक मौत, वही विपक्ष जहां बगावत आम बात है क्योंकि कोई अनुशासन नही है, व्यक्तिगत स्वार्थ इस कदर हावी है की पार्टी दूसरे दर्जे पे रहती है और खुद का स्वार्थ और महत्वाकांक्षा प्रथम दर्जे पे रहती है ।
आज के समय की राजनिति में अगर आप माइक्रो लेवल पर प्रबंधन नहीं कर सकते है तो आप बीजेपी के आस पास भी नहीं रहेंगे और किसी भी परिस्थिति में लोकतंत्र में सही इरादों और लक्ष्य के साथ भी आप जीत नहीं सकते हैं।
ऐसे कही राज्य है जहां बीजेपी, जिसका जमीनी लेवल पे परिणाम कुछ अलग था और जब परिणाम आया तो एकदम से इसके उलट था जिसका कारण अनुशासन और माइक्रो प्रबंधन था ।
पिछले कई चुनावों को देखें तो मध्यप्रदेश, राजस्थान, पंजाब, गुजरात, हरियाणा यहां विपक्ष अगर चाहता तो शायद शानदार जीत और सरकार बना सकता था और आसानी से बीजेपी के विजयरथ को रौका जा सकता था, लेकिन मध्यप्रदेश मे कमलनाथ का स्वार्थ, राजस्थान मे अशोक गहलोत का स्वार्थ, गुजरात में आपसी लड़ाइयां और राष्ट्रीय नेताओं की असक्रियता, पंजाब में एक दूसरे को नीचे गिराने के लिए प्रतिस्पर्धा, हरियाणा में आपसी लड़ाइयां, निजी स्वार्थ और गुटबाजियां, यह ऐसे कई कारण थे जिनके कारण विपक्ष ने पूरी तरह से अपने ही हाथों अपना गला घोटा, वरना शायद हिंदुस्तान में वर्तमान परिपक्ष्य में राजनीतिक दिशा और दशा अलग होती है ।
आज की परिस्थिति में विपक्ष की वापसी सिर्फ तभी हो सकती है जब वो बीजेपी जैसी पार्टी के अनुशासन और माइक्रो प्रबंधन का अनुशरण करें और व्यक्तिगत स्वार्थ को त्याग कर पार्टी के हित को आगे रखे और पार्टी में इस बात पर तर्रकी हो की पार्टी के कार्यकर्ता का त्याग कितना है ।
बीजेपी जो हर तरह से मजबूत है, अनुशासन से, आर्थिक रूप से, माइक्रो प्रबंधन में, जमीनी कार्यकर्ताओं से संपर्क, RSS का सहयोग, धार्मिक भक्ति में लिप्त करोड़ों लोगों का बिना शर्त वोट बैंक और साथ में नरेंद्र मोदी, अमित शाह, अडानी और अंबानी का राजनीतिक दिमाग ।
विपक्ष जिसके लिए मुझे संभावना जरूर दिखती है, या तो यह विपक्ष अपने आप को आने वाले समय में बदल लेगा या फिर आने वाले समय में हिंदुस्तान में एक नई क्रांति होगी जो बीजेपी और विपक्ष दोनों को खत्म कर देगी, क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है की आज भी हिंदुस्तान इस इंतजार में है की कोई आए जो उनके मुद्दों को लेकर बात करें, उनको सुने, उनके जीवन को आसान करने के लिए राजनिति करें और जब कोई ऐसा आएगा तो आंधी और तूफान में आज के पक्ष और विपक्ष शायद दोनों हवा हवा होते दिख सकते है ।
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