तीन तलाक - Triple Talaq


किसी महिला के साथ अन्याय,  नहीं नहीं आप इसे ऐसे समझिए किसी इंसान के साथ अन्याय हो जाए तो ऐसी परिस्थिति में आप क्या करेंगे उसे न्याय देने की कोशिश करेंगे या न्याय दिलाने की बात करेंगे | ऐसा ही कुछ तीन तलाक है जहां एक पुरुष अपने आप को सब कुछ समझता है और सोचता है कि फैसला लेने का अधिकार सिर्फ उसे ही है | वो पहले शादी करता है या अगर मुस्लिम भाषा में कहें तो एक समझौता करता है और जब उसे लगता है कि अब मुझे समझौता रद्द कर देना चाहिए तो वह तीन बार तलाक शब्द बोलकर समझौता रद्द कर देता है  उसके बाद उसका उस पत्नी के साथ कोई रिश्ता नहीं रहता है और वह अब नए समझौते की तलाश में होता है |
 ऐसा ही कुछ हमारे देश में एक महिला के साथ हुआ और उसने फैसला लिया कि इस समझौते ने उसका जीवन बिगाड़ दिया और अब वह चुप नहीं बैठ सकती और इसी के चलते उसने सुप्रीम कोर्ट  का दरवाजा खटखटाया और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की और फैसला इंसानियत और संवैधानिकता  के आधार पर उस महिला के पक्ष में आया और तीन तलाक को इंसानियत से परे यानी असंवैधानिक बता दिया गया |
 टीवी पर डिबेट होने लगी धर्म के ठेकेदार अपनी अपनी बात  रखने लगे किसी ने इसे गलत बताया तो किसी ने इसे राजनीति से जोड़ दिया तो किसी ने इसे इंसानियत से जोड़कर देखा | आज सोचने वाला विषय यह है कि यह जो धर्म के ठेकेदार हमारे देश में दोनों तरफ है मतलब हिंदुओं की तरफ भी है और मुस्लिम की तरफ भी है और यह लोग मानते हैं कि धर्म का सबसे ज्यादा ज्ञान इनको ही है और सच  कहे तो यह लोग धर्म की आड़ में अपना वर्चस्व चाहते हैं |
हिंदू धर्म का ठेका आरएसएस और योगी आदित्यनाथ ने लिया हुआ हैं, वही मुस्लिम धर्म का ठेका हैदराबाद के एक सांसद असदुद्दीन ओवैसी और उनके भाई ने लिया हुआ हैं |  लेकिन आज सवाल यह है कि क्या तुम धर्म की आड़ में किसी के साथ ज्यादती करोगे ? यह कहां तक ठीक है | एक तरफ हिंदुओं के ठेकेदार मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाना चाहते हैं वहीं दूसरी तरफ उनके स्वयं के धर्म में मान्यताओं के आधार पर महिलाओं के साथ जो अन्याय किया जा रहा हैं उन पर वो कुछ नहीं बोलेंगे |
मैं सबरीमाला मंदिर की बात कर रहा हूं जिस मंदिर में प्रवेश पर महिलाओं की पाबंदी थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे भी इंसानियत से परे बताया और महिलाओं का प्रवेश करवाया लेकिन बाद में धर्म के ठेकेदारों ने इसे मान्यताओं कि आंखों से देखना शुरू कर दिया और अब मुस्लिम लोग भी तीन तलाक को अपनी मान्यताओं की आंखों से देखना चाहते  हैं | इन सब धर्म की मान्यताओं के बीच आज सवाल यह है कि जिन महिलाओं के साथ यह सब होता है आखिर उन पर क्या गुजरती होगी क्या हमने कभी सोचा ?  जी नहीं |
 हम पूरी दुनिया को पुरुष प्रधान बनाना चाहते हैं हम चाहते हैं कि पूरी दुनिया पुरुषों के सहारे चले और महिलाओं के सामने धर्म की और अपने स्वार्थ रूपी फायदे की दीवार बनाकर उन्हें एक तरफ कर दिया जाए |
 लेकिन आज समय बदल रहा है मैं स्वयं अकसर भारतीय जनता पार्टी और नरेंद्र मोदी की नीतियों और कार्यों के खिलाफ रहता हूं लेकिन तीन तलाक पर कानून बनाने का उनका फैसला काबिले तारीफ है | इस मुद्दे पर मुझे लगता है कोई धार्मिक राजनीति नहीं हो तो बेहतर है |
आज हम 21वीं सदी में है और उसके बावजूद भी अगर हम उन सब पुरानी परंपराओं और मान्यताओं के सारे इंसानों के बीच दीवार खींचने की कोशिश करें तो मुझे लगता है यह सरासर गलत है | आज सोचने विचारने वाला सवाल यह है जिस शादी  को एक समझौता कहा जा रहा है,  जिसमें सबकुछ निर्णय लेने का अधिकार सिर्फ एक  पक्ष के पास है | अगर आप इसे समझौता ही कहना चाहते हैं तो फिर निर्णय लेने का अधिकार दोनों पक्षों के पास होना चाहिए | जिस समझौते में पुरुष को तीन तलाक देने का अधिकार है  उसी समझौते में महिलाओं को भी तीन तलाक देने का अधिकार होना चाहिए | लेकिन ऐसा नहीं होगा क्योंकि हम महिलाओं को सिर्फ एक वस्तु समझना चाहते हैं जिसमे जितने दिन जरूरत हो महिला को काम लिया और फिर तीन तलाक रूपी मिसाइल से उस समझौते को रद्द कर दिया जाता है | ऐसी तमाम  धार्मिक चीजें चाहे वह हिंदू धर्म में हो मुस्लिम धर्म में हो यह सिर्फ हमारे देश को तोड़ने का काम कर सकती है, हमें एक दूसरे से लडवा सकती है और अंत में हमारे देश को फिर से गुलाम बनवा सकती हैं |
 मैंने अकसर ऐसा देखा है जो लोग धर्म के नाम पर राजनीति करते हैं  जो इंसानियत को धर्म के नाम पर  कम आंकना चाहते हैं  उन लोगों की वास्तविकता यह है कि उन लोगों को  सदियों से चली आ रही परंपरा से कभी कोई परेशानी नहीं हुई और इसकी वजह हम (आम जनता) हैं  क्योंकि हम लोगों ने ऐसे लोगों को अपने सिर पर  बिठा कर अपना चेहता बनाया हुआ और उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की कोशिश कर रहे हैं|  मेरा मानना है कि जिस दिन तीन तलाक के पक्ष में बोलने वाले पुरुषों की मां बहन और बेटियों के साथ तीन तलाक रूपी नाटक होगा वो खुद भी तीन तलाक को गलत कहना शुरू कर देंगें |
 हम भारतीयों की यही समस्या है कि हम सब जब तक अपने साथ कुछ गलत नहीं होता है तब तक हम चुप रहना बेहतर समझते हैं क्योंकि हमें लगता है अभी तक हमारा कोई नुकसान नहीं हुआ | लेकिन जिस दिन होगा  हमारे साथ भी वही होगा जो हमने स्वयं ने दूसरों के साथ होते देखा  और यही तरीका चलता रहेगा और हम बारी-बारी से अपने आप को और अपनों को कोसते रहेंगे और अपने स्वार्थ में  इस प्रकार व्यस्त होंगे कि साथ आने की हिम्मत तक नहीं कर  पाएंगे |
 मैंने कई मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक के समर्थन में  सड़क पर उतरते देखा तो मेरा दिमाग और मैं कुछ देर के लिए ठहर सा गया  और सोचने लगा कि अब क्या किया जाए ? मैं असमंजस में था मैंने सोचा कि जिसकी आशा नहीं थी वही हो रहा था |
 कुछ क्षणों में मेरे दिमाग द्वारा मुझे एक सवाल पूछा गया और कहा अब क्या होना चाहिए ? जिसमें एक तरफ देश था और एक तरफ लोकतंत्र | मुझे कहा गया कि अगर 100 लोगों में से  20 लोग सुरक्षित हैं 80 लोगों के साथ अन्याय हो रहा है और इन 80 लोगों में से  70 लोग अन्याय सहकर भी चुप रहना चाहते हैं वहीं 10 लोग ऐसे हैं जो अन्याय नहीं सहन करना चाहते हैं और 20 सुरक्षित लोगों ने  उन 70 लोगों को  जिनके साथ अन्याय हो रहा था उनको भी अपने साथ कर लिया | ऐसी परिस्थिति में तुम क्या करोगे ?
मैंने सोचा कुछ देर और
 मेरा जवाब  था मैं 10 लोगों को न्याय दिलवाउंगा भले  ही यहां लोकतांत्रिक रूपी ढांचे में 90 लोग एक तरफ हो  लेकिन जरूरत उन 10 लोगों को न्याय दिलाने की है क्योंकि  वह 90 लोग एक साथ इसलिए हैं क्योंकि उनमें अन्याय सहन करने की  क्षमता है |
 यही परिस्थिति आज उन सड़क पर उतरने वाली महिलाओं की है जो अन्याय सहकर भी चुप रहना चाहती है धर्म के ठेकेदारों का साथ देना चाहती है | जबकि दूसरी तरफ वह महिलाएं जिन्होंने न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया क्योंकि वो  तीन तलाक का दर्द नहीं सहन कर पायी |
 और जो महिलाएं सड़क पर उतर कर तीन तलाक का समर्थन कर रही है आखिर उन महिलाओं के पास अब संशोधित बिल के बाद अत्याचार सहने का विकल्प भी उपलब्ध है अगर वह इसका विरोध कर रही है तो उन महिलाओं के लिए विकल्प है कि वो  इस बिल को नजरअंदाज करें  और तीन तलाक जब चाहे तब स्वीकार करें क्योंकि स्वतंत्रता और अपनी निजता पर मुझे लगता है आप जैसा चाहे वैसा फैसला ले सकती है  |
 लेकिन सोचने और विचार ने वाली बात यह है कि आखिर धार्मिक मान्यताओं के आधार पर उन महिलाओं को क्यों घसीटा जा रहा है जो अपने साथ हुए अन्याय को नहीं सहना चाहती हैं | यह बात उन महिलाओं को सोचनी चाहिए जो  तीन तलाक के समर्थन में सड़कों पर निकल रही हैं |मेरा मानना है इंसानियत के खिलाफ किसी का भी होना चाहे वह धार्मिक मान्यता हो या किसी फैसले का होना  मुझे लगता है यही अन्याय होता है |  इस दुनिया में सबसे बड़ा धर्म इंसानियत है अगर कोई भी धार्मिक मान्यताएं परंपरा इंसानियत पर सवाल उठाती हो तो मुझे लगता है ऐसी मान्यताएं और परंपराएं समाप्त होनी चाहिए और तीन तलाक, मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी यह वही मान्यता परंपरा है इसीलिए यह खत्म हो इसी में हमारे देश का भविष्य है उन्नति हैं |

जय हिन्द  | जय भारत |

Comments

Dr Vikram sony said…
Nice thought Dr Ankit nahta

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