जरुरी क्या हैं ? राम मंदिर या वर्तमान की शिक्षा व्यवस्था, चिकित्सा व्यवस्था, किसानों की आत्महत्या और महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दे |
पिछले तीन दशकों से हमारे देश में राम मंदिर के नाम पर कई लोग प्रधानमंत्री बन गए तो कई लोग मुख्यमंत्री बन गये और कई मंत्री बन गए लेकिन राम मंदिर के मुद्दे पर आज तक कोई समाधान नहीं निकला है | इसे अगर दूसरे परिपेक्ष में देखें तो राम मंदिर अगर बन गया होता तो कई लोगों की राजनीतिक विरासत खतरे में जा सकती थी या अगर बन भी जाय तो भविष्य में भी जा सकती है | तीन दशकों से जब जब चुनाव आए हैं राम मंदिर का मुद्दा हमेशा हावी रहा है, कभी गाय के नाम पर वोट बटोरे गए तो कभी हिंदू मुसलमान और राम मंदिर के नाम पर वोटों की राजनीति की गयी | लेकिन आज सोचने वाला विषय यह है कि क्या राम मंदिर बनने से या ना बनने से लोगों का जीवन बदल जाएगा ? देश जिन परिस्थितियों से वैश्विक स्तर पर लड़ रहा है, हम भारतीयों की पहचान और हमारी भारतीयता पर सवाल उठा रहा है उसका क्या ?
आज जहां तक मेरा मानना है राम मंदिर या हिंदू मुसलमान कि राजनीति के बजाय देश को पीछे धकेलने वाले उन मुद्दों पर बात होनी चाहिए जिसकी वजह से आज हम दुनिया में पीछे खड़े हैं लेकिन हमारी सोच हिंदू मुसलमान और राम मंदिर से ऊपर उठ ही नहीं पा रही हैं |
देश में युवाओं के पास रोजगार नहीं है, किसान आत्महत्या कर रहा है, सरे आम लोगों पर गोलियां चलाई जा रही है, मां बहन बेटियों के साथ बलात्कार और अत्याचार हो रहा हैं | लेकिन कोई भी राजनेता इन विषयों पर अपनी राजनीतिक प्राथमिकता नहीं देना चाहता है वह तो हमारे देश की आम जनता को आस्था और संस्कृति से जोड़कर वहां पहुंचाना चाहते हैं जहां से उसका निकलना नामुमकिन हो जाए | राम मंदिर देश की बहुसंख्यक आबादी का आस्था का विषय है इसे कोई मना नहीं कर सकता लेकिन आज हम राम मंदिर के नाम पर लड़ कर देश को तोड़ने का काम कर रहे हैं | जिससे मैं कभी सहमत नहीं हो सकता हूँ |
आपसी सहमति से राम मंदिर का निर्माण हो, यही एक रास्ता है वरना अगर बहुसंख्यकता के आधार पर राम मंदिर का निर्माण होता है तो वो मासूम लोग जिनका कोई कसूर नहीं है, जो सिर्फ लड़ाने वाले दोनों दलों के साथ खड़े हैं, जिन्हें अपने भविष्य और अपने परिवार की चिंता नहीं है, जो अंधे या बिना सोच समझ वाले समर्थक बनकर हाथों में हथियार उठाने के लिए खड़े हैं नुकसान सिर्फ उन लोगों का होगा | लड़ाने वाले लोग तो आदेश देकर या हिंसा फैलाकर अपनी सुरक्षा का इंतजाम करते नजर आएंगे लेकिन बेकसूर और मासूम लोग मारे जाएंगे | दूसरी तरफ शहरों के नाम बदलकर यह महसूस करवाया जा रहा है कि यह हिंदुओं का देश है और अल्पसंख्यक (मुस्लिमों) समुदाय को यह बताने की कोशिश की जा रही है देश में आप रहना चाहते हो तो आपको हमारी
संस्कृति के अनुरूप चलना होगा | शहरों के नाम बदलने पर यह तर्क दिया गया कि
मुगल शासकों ने आज से सदियों पहले जो हमारे देश में नाम बदलने की परंपरा शुरू कि आज हम उसे फिर बदल कर पुरानी घटनाओं को याद कर रहे हैं और बता रहे हैं कि किस प्रकार हिंदू संस्कृति पर हमला किया
गया था |
मैं
इस तर्क से
कुछ हद तक सहमत हो सकता लेकिन पूरी तरह से नहीं, क्योंकि मेरा मानना है कि आज नाम बदलना हमारे देश की प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए, प्राथमिकता देश की शिक्षा व्यवस्था, युवाओं का बेरोजगार होकर घूमना, किसानों कि आत्महत्या जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देने की जरूरत है |
आज जिस तरह से यह सब घटनाएं हमारे देश में हो रही है इससे हमारे देश में आपसी दूरियां और मतभेद पैदा किए जा रहे हैं
जिसका फायदा मुझे लगता है विदेशी देश आने वाले भविष्य में उठाने के लिए तैयार हैं |
आज पूरी दुनिया को नई दिशा देने वाले लोग भारतीय हैं लेकिन फिर भी आज हमारा अपना कुछ भी नहीं हैं | हम सिर्फ जाति, धर्म, राम मंदिर, और
गाय के नाम पर बांट कर कहीं ना कहीं अपनी राजनीती को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं जो हमें जोड़ने की बजाय तोड़ने का काम कर रही है | जिसका एक उदाहरण 2 अप्रैल 2018
का दलित समुदायों का आंदोलन था | आज वो अपनी अलग ही एकता के गीत गा रहे हैं, हिंदू राम मंदिर बनवाने में व्यस्त है और मुस्लिम बाबरी मस्जिद बनवाने की सोच रहे हैं | जिससे साफ-साफ नजर आता है कि देश हमारे लिए प्राथमिकता नहीं है हम अपनों और अपने आप को प्राथमिकता दे रहे
जो कहीं ना कहीं एक बार फिर से हमें गुलामी की तरफ धकेल सकती है |
जय हिंद, जय भारत |
जय जवान, जय किसान ||

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